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शुक्रवार, 4 जून 2010

मैं लिखता हूँ

मैं लिखता हूँ इसलिए कि मुझे कुछ कहना होता है. मैं लिखता हूँ इसलिए कि ताकि मैं कुछ कहने के काबिल हो सकूँ.
मैं अफ़साना नहीं लिखता, हकीकत यह है कि अफ़साना मुझे लिखता है. अफ़साना मेरे दिमाग में नहीं, जेब में होता है जिसकी मुझे कोई ख़बर नहीं होती. मैं अपने दिमाग पर ज़ोर देता हूँ कि कोई अफ़साना निकल आए. मैं इसके कहने पर कलम या पैंसिल उठाता हूँ और लिखना शुरू कर देता हूँ- दिमाग बिल्कुल ख़ाली होता है लेकिन जेब भरी होती है, खुद-ब-खुद कोई अफसाना उछलकर बाहर आ जाता है...
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3 टिप्‍पणियां:

  1. Bhai Yogesh..Bahut achha aur bahut sahi likha hai.Apni lekhni se aise hi sundar sunar rachnao ko bikherte raho.Yahi asha hai.

    Tarun Joshi

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  2. ऐसे अच्छे अच्छे लेख लिखने के लिए बहुत बहुत बधाई.लेखनी का यही कमाल होता है.

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  3. भैया जी बस आप लोगो का ऐसे ही आशीर्वाद मिलतें रहे यही कामना करता हूँ ..
    आपका बहुत बहुत धन्यवाद इतनी साड़ी सुंदर टिप्पड़ियो के लियें...

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