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गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

जहाँ साथ रहे हों,जहाँ दोस्तों के मेले हों
हर सुबह संदील हो, हर शाम रंगीन हो
कुछ ऐसा ही था अपना यह स्पेशल घर
जहाँ गम की कोई ना बात हो,हमेशा खुशियों की सौगात हों
सोचता हूँ की एक ऐसा ही घर बनाऊं,अपने प्यारें दोस्तों को बुलाऊँ
फिर मिलकर झूमें गायें धूम मचाएं जस्न मनाएं...

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

"वक़्त"
हर खुशी है लोगो के दामन में, लेकिन एक हसी के लिए वक़्त नहीं,
माँ की लोरी का एहसास तो है, पर माँ को माँ कहने के लियें वक़्त नहीं,
सारे रिश्तो को तो हम मार चुकें, अब उन्हें दफनानें का भी वक़्त नहीं,
सारे नाम दिलो दिमाग में है, लेकिन दोस्ती के लिए वक़्त नहीं,
गैरो की क्या बात करें, जब अपनों के लिए ही वक़्त नहीं,
पैसे की दौड़ में ऐसे दौडें की थकने का भी वक़्त नहीं,
तू ही बता ऐ जिंदगी इस जिंदगी में क्यों किसी को वक़्त नहीं...

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

हाय रे हाय दिल्ली की भीड़ा भाड़ी...

दिल्ली की कहानी योगेश की जुबानी अगर दिल्ली के वाशिंदों को बुरा ना लगे ...
परन्तु मेरी एक छोटी सी कविता जो कही न कहीं थोड़ी ही सही मगर दिल्ली की कहानी बयान करती है...

हाय रे हाय दिल्ली की भीड़ा भाड़ी
एक ओर दौड़ती मोटर गाड़ी, दूजी ओर साइकिल रिक्शे की सवारी
हाय रे हाय दिल्ली की भीड़ा भाड़ी...
जहा अमीर करते आराम की सवारी, वही भागते बच्चें बूढे गरीब नर नारी
हाय रे हाय दिल्ली की भीड़ा भाड़ी...
कही भिकारी कही मदारी, खुले आम होती चोरीचारी
कही एक दूजे पे चड़ती सवारी, तो कही होती पॉकेट मारी
हाय रे हाय दिल्ली की भीड़ा भाड़ी...
कोई नेता कोई अभिनेता तो कही पे छात्रनेता
करतें बीच सड़क हाहाकारी, आन्दोलन करतें आंदोलनकारी
हाय रे हाय दिल्ली की भीड़ा भाड़ी...
हाय रे हाय दिल्ली की भीड़ा भाड़ी...

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