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गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

क्रोध दुश्मनी का बीज . . .

आज मेरी कलम क्रोध के काफी समीप पहुच चुकी थी। मुझे आकर के बोली कि चलो आज इसका अंत समय आया आओ देखें की क्रोध के बीज ने कैसा खेल रचाया।

क्रोध

आज अरसे बाद कोई अपना मुझसे खफा खफा सा नजर आया,
क्रोध की बदौलत दुश्मनी का एक पौंधा सा उगता नजर आया,
समय की धारा से शायद मैंने ही कुछ ऐसे सीचा उसें,
खामोशी की छावं तले, दुश्मनी का फूल उगता नजर आया,
पौधें को दुश्मनी का वृक्ष बनता देख, कहीं दुश्मन बनता नजर आया,
एक तुच्छः से क्रोध के बीज से, दुश्मन सा भयंकर फल पनप आया,
क्रोध का बीज बोना जरुरी है क्या ? बारम्बार प्रश्न मन में उठता नजर आया,
दुश्मनी के वृक्ष में, अहंकार तो कही पे स्वार्थ की शाखाओं का संसार नजर आया,
इन फलो को पकने से पहले आज मेरी कलम ने इन्हें नेस्तोनाबुत करने का मन बनाया,
दुश्मनी के वृक्ष में विनम्र भाव एवं खुशी के प्रवाह से भरा हुआ तेज़ाब डालने को मन आया,
क्रोध के बीज को कभी ना बोयें, क्रोध के इस बीज का अब अंत समय आया।

मैंने सुना है कि क्रोध नहीं आता यह कहना काफी मुश्किल है। क्रोध का जन्म इच्छा के गर्भ से होता है और इच्छा सबके अंदर है। हमारी इच्छाएं पूरी नहीं होती तो हमें क्रोध आता है। इच्छा के रूपान्तरण की कला जो सीख जाता है शायद वह क्रोध से बच सकता है।

"क्रोध दूसरे से ज्यादा अपना खुद का नुकसान करता है। इसका अहसास हमें तब होता है जब हमारा क्रोध शांत हो जाता है।"

5 टिप्‍पणियां:

  1. Baccha.....you are doing great job.

    We must appreciate that going. I always like to read your blogs/poems.

    Keep your good work carry on.

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  2. मेरा दिल तो बाग बाग हो गया आज तो . . . बस ऐसे ही मेरी धडकनों में साँस बनकर जिंदगी का लुत्फ़ उठातें रहो . . .
    हाथ से हाथ मिलाते रहो और दुनिया को दिल में बसातें रहो . . .
    क्रोध का परित्याग करो और मन में विनम्र भावनाओं की कामना रखों . . .
    और ऐसे ही मुझे प्रोत्साहित करते रहा करो ताकि में अपना मनोबल ना खोने पाऊँ कभी . . .

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