आखिरकार मेरी कलम मजबूर हो गयी और एक बार फिर से मेरी कलम के मोती बिखर पड़ें...
लेखक की कविता...
"कभी बारिश मे भीगते भीगते तुम यूही चले आओ"
जानती हूँ ये सिर्फ कविताओ कहानिओ मे होता हैं ,,
पर कभी बारिश मे भीगते भीगते तुम यूही चले आओ ,,
खूब भीगे से झेपे झेपे खड़े क्या अन्दर आ जाऊ ,,
ये कहके जवाब का बिना इंतज़ार किए अन्दर चले आओ ,,
नहीं यार बस निकलूगा दो मिनट मे हो रही हैं देर ,,
ये कहते कहते घंटो ढहर जाओ ,,
किसी छोटी सी बात पे ढेर सारा खिलखिला के ,,
मेरे घर मेरे गरीब खाने मे मोतियो के ढेर लगा जाओ ,,
निकल पड़े फिर कुछ येसी बात ,,
करने लगु जब मैं बीते सालो का हिसाब किताब ,,
तुम बहुत खूबसूरती से बातों को मोड के ,,
कुछ अपनी ही सुनाने लग जाओ ,,
कुछ खाते कुछ पीते कुछ बतियाते ,,
चलो ये चुपचाप खाकर खतम करो ,,
ऐसा कुछ कहके हक़ जमा जाओ ,,
जिस दिल को अब बहुत अच्छे से ,,
समझा लिया था ,,
तुम फिर से उस दिल मे तोड़फोड़ मचा जाओ ,,
और फिर जब मैं बांध लू ढेर सी उम्मीदे ,,
तुम फिर आदतन चप्पल पहन के ,,
बारिश मे भीगते भीगते चले जाओ ,,
मेरी कलम के मोती...
"अच्छा होता अगर लेखक के आंसुओ से, बारिश की बूँदें ना निकली होती...
आपकी कलम की स्याही इस कदर भीगी भीगी ना होती...
में भी मुसुकुराता आज, अगर मेरी पलके भी भीगी ना होती...
इन बारिश की बूंदों में कवि का गम तो देखो, कवि की कल्पना को देखो...
उसके पास ना होने का एह्साह तो देखो, मिलन की प्यास तो देखो...
यह दिल का दर्द है, यही प्रेम है, कवि के ज़ज्बातो की बरसात तो देखो..."