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गुरुवार, 25 मार्च 2010

हाय रे हाय दिल्ली की भीड़ा भाड़ी...

दिल्ली की कहानी योगेश की जुबानी अगर दिल्ली के वाशिंदों को बुरा ना लगे ...
परन्तु मेरी एक छोटी सी कविता जो कही न कहीं थोड़ी ही सही मगर दिल्ली की कहानी बयान करती है...

हाय रे हाय दिल्ली की भीड़ा भाड़ी
एक ओर दौड़ती मोटर गाड़ी, दूजी ओर साइकिल रिक्शे की सवारी
हाय रे हाय दिल्ली की भीड़ा भाड़ी...
जहा अमीर करते आराम की सवारी, वही भागते बच्चें बूढे गरीब नर नारी
हाय रे हाय दिल्ली की भीड़ा भाड़ी...
कही भिकारी कही मदारी, खुले आम होती चोरीचारी
कही एक दूजे पे चड़ती सवारी, तो कही होती पॉकेट मारी
हाय रे हाय दिल्ली की भीड़ा भाड़ी...
कोई नेता कोई अभिनेता तो कही पे छात्रनेता
करतें बीच सड़क हाहाकारी, आन्दोलन करतें आंदोलनकारी
हाय रे हाय दिल्ली की भीड़ा भाड़ी...
हाय रे हाय दिल्ली की भीड़ा भाड़ी...

4 टिप्‍पणियां:

  1. Bahut achha likha hai...Apni kalam ko aise hi achhi achhi rachnao ke liye chalte rahna..Aise hi sangrah banate raho...

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  2. हाँ क्यों नहीं आप ऐसे ही प्रोत्साहन देते रहिये...
    इससें मेरे आचार व्यवहार और विचार में वृधि होगी ...

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  3. सही कहा है.भागम भाग और भागम भाग इसी का नाम दिल्ली है...यहाँ लोग दिन भर जाने कौन सी दौड़ दौड़ते रहते हैं...भावनाओं के लिए किसी के पास कोई जगह नहीं...

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  4. हाँ दद्दा जी वैसे अब आप भी इसी माहोल में हो अपना ख़याल रखना दिल्ली अब ना रही दिल वालों की ये तो बस रह गयी है अब दलालों की . . .
    और आपकी होली कैसी रही . . .

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